Thursday, July 25, 2019

कारगिल विजय: ये युद्ध नहीं आसान

जिंदगी जब तुझको समझा,
मौत फिर क्या चीज है,
ऐ वतन तू हीं बता, तुझसे बड़ा क्या चीज है
भरी जवानी में मां भारती के चरणों में,अपने प्राणों का बलिदान करने वाले, अमर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पण करता हूँ। कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।
भगवत गीता का एक श्लोक है: -
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌’
यानि 'या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।' शायद इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के उन शूरवीरों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को कारगिल की धरती से पीछे खदेड़ दिया था। मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी...यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।कारगिल विजय का हिस्सा रहे सभी सैनिकों को नमन। आपकी वीरता आज भी लोक स्मृति में सजीव है जिसे भावी पीढ़ियां श्रद्धापूर्वक स्मरण करेंगी। कृतज्ञ राष्ट्र अमर शहीदों, वीर सैनिकों और उनके परिजनों के त्याग का सम्मान करता है।
रक्त वीर शहीदों का था, हर सपूत बलिदानी था, कारगिल पर्वत शिखर पर पवन चला तूफानी था, हिमप्रपात बन हिमगिरि से रक्त शत्रु का जमा दिया, विजय दिवस की शौर्य पताका देने वाला अभिमानी था।

मैं नहीं हम

सोचा था कोई ग़जल लिखूँ ,4-5 शेर में ही काम हो जाता। पर शायद अब कवितायें नाराज हैं, ख्यालों में आराम की जगह काम आ चुका है और वो क्या हैं ना कि आजकल राइमिंग में भी मैथमेटिक्स आ जाती हैं तो फाइनली ये आईडिया ड्रॉप करना पड़ा। माना की मेरा इस तरह करियर के लिए सीरियस होना अच्छा है। पर सही मायने में मुझे ये इतना भी अच्छा नही लगता। मैं बिलकुल खाली सा हो गया हूँ। गाने नही सुन पाता, खेल भी नहीं पाता,बात भी नही कर पाता तो किस्से भी नही होते मेरे पास जो लिख सकूँ। उदासी भी नही बची वरना कुछ कविता ही बन जाती। क्रिकेट, उसकी तो बात ही नही करनी। सिर्फ और सिर्फ सिलेबस की किताबें है, उनसे दिक्कत नही हैं, वो भी अच्छी हैं, पर फिर भी कुछ खालीपन तो आ ही गया हैं।

वैसे तो कितने सारे किस्सों को लिख के रखा हैं मैंने ,लेकिन फिर भी कुछ कम ही लगते हैं। पिछले 18 महीनो में मैंने जाने कितने किस्से गँवा दिये जो मैं लिखना चाहता था- मैं लिखना चाहता था मेरे जिएं हुए हर लम्हे को, पर मैंने दूसरा रास्ता चुन लिया और वो सब अधूरे किस्से अधूरे रहे। शायद उन किस्सों का अधूरापन ही मुझे कभी भरने नही देता इसलिए इतना खालीपन रहता हैं मेरे पास।

भले ही मैने कितना भी सहेज के रखे हों लेकिन फिर भी सबकुछ तो नही सम्भाला जा सकता। 'मैं' उन किस्सों को नही सम्भाल पाया लेकिन इसका मतलब ये भी नही न की 'मैं' सम्भालना ही छोड़ दूंगा। मैं आने वाले किस्सों को सम्भाल लूँगा। मैं फिर से लिखूंगा फिर से आगे बढूंगा क्योंकि मुझे लगता हैं की मैं कुछ भी कर लूँ पर जो सुख लिखने में हैं वो सुख किसी में भी नही हैं।

चुकीं आज मुझे लिखना ही है तो कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा और कोई ऑप्शन भी नही हैं। इसलिये लिख रहा हूँ, पता नही क्या लिखूंगा और कहाँ खत्म करूँगा। वैसे तो 'मैं' पर लिखना था पर पता नही अब कुछ सूझ नही रहा इसलिए खुद पे लिख रहा हूँ।

अजीब हैं पर सच तो यही हैं की मुझे 'मैं' पसंद नही हैं। मुझे तो अब भी वही 'हम' पसंद वेलडिसिप्लिन्ड और कॉंफिडेंट। दिनभर होने वाली अनाब सनाब बातें चंद मिनटों में सिमट गई हैं, और ये भी नही की मुझे मालूम नही चला, मुझे सब मालूम हैं। जाने कितनी बार मैं हताश हुआ और जाने कितनी बार मुझे लगा की मैं ये नही कर सकता ये मेरे बस की बात हैं ही नही। लेकिन हर बार तूने मुझे मुझ से ही बचाया। थैंक्यू मुझे इस रास्ते पर सहारा देने के लिए। मुझे मेरी कहानी के हर हिस्से से प्यार हैं, मुझे तुझसे जुड़े हर किस्से से प्यार हैं। अरे वाह, राइमिंग हो गई। देख लिखते लिखते फिर से कविता बनने लगी हैं।
मैं शायद जैसा था वैसा कभी नही हो पाउँगा लेकिन मैंने ये तुझसे पहले भी कहा था और अब भी कहता हूँ, मैं नही जानता आगे क्या होगा और जानना भी नही चाहता क्योंकी वो मेरे बस में हैं ही नही, मेरे बस में सिर्फ कोशिश करना हैं और वो मैं आखिरी दम तक करूँगा।

"नितिन सिंह"