Thursday, October 29, 2020

रक्तबीज रुपी गरीबी

 गणतन्त्र से गण गायब हो रहा है और तंत्र काबिज है फिर भी मैंने हमेशा अपने को परिभाषाओं से दूर और अनुभवों में रखने का प्रयत्न किया... लेकिन एक सवाल जो बार बार मेरे भूंसा भरे दिमाग में आता है कि 73 साल पहले मिली आजादी और आजाद देश का नागरिक होने के अलावा किस बात पर गर्व करूँ ? गर्व करूँ, आजादी के 73 सालों में रक्तबीज की तरह बढ़ती गरीबी पर? गर्व करूँ, जान से भी अधिक भूख की चिंता पर? या इस बात पर की अगर हमारे विचार वाकई अमीर हो जाएं तो क्या गरीबी खत्म हो सकती है?

 गरीबी एक अदृश्य समस्या है जो किसी व्यक्ति और उसके सामाजिक जीवन को कई तरह से बुरी तरह प्रभावित करती है एक ऐसी स्थिति है जिसे कोई भी नहीं जीना चाहता है। इस ग्रह पर मानवता की भलाई के लिए गरीबी की समस्या को तत्काल आधार पर हल करना बहुत आवश्यक है, वैसे हमारे प्रखर प्रखण्ड विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का लक्ष्य गरीबी दूर करना नहीं बल्कि समृद्धि लाना होना चाहिये क्योंकि समृद्धि से ही गरीबी उन्मूलन संभव है परन्तु बता दूँ कि गाँवों में अगर 20 रुपए में शुद्ध पानी की बोतल मिल रही है तो यह तरक्की नहीं, प्रजातंत्र के मुँह पर तमाचा है कि सरकारें 73 सालों में भी देश की जनता को शुद्ध पानी नहीं पिला सकी ऐसे ही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम सब बिना तुलसी गंगाजल पिये ही अपनी-अपनी चुप्पियों को लेकर मर जाएँगे और हमारा सबसे आख़िरी ख़याल होगा हमें बोलना चाहिए था... इसलिए बोलिये और अपनी सही बात को तार्किक रूप से रखिये क्योकि लोकतंत्र में सामाजिक सुरक्षा पाना हर नागरिक का अधिकार

है यह नियम सब पर लागू होता है आप पर भी और मुझ पर भी । फिलहाल बस यही कहना है की आजादी के 73 वर्षों बाद भी हमारे कृषि प्रधान देश में कम से कम लोगों को भूखे पेट तो नहीं ही सोना चाहिए...खैर गरीब चाहे भारत का हो या पडोसी पाकिस्तान का या किसी और देश का गरीब और गरीबी एक जैसे होती है इसका अपना कोई नहीं...। 

 नितिन सिंह

Monday, April 13, 2020

संविधान निर्माता: डॉ. बी.आर अम्बेडकर

हम भारतीय समानता, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, बंधुत्व और सामाजिकता के सिद्धांतों पर जीते हैं और यही हमारे भारतीय संविधान द्वारा हमें सिखाया गया है। भारत के संविधान को एक न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ के साथ-साथ सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक भीमराव रामजी अंबेडकर ने डिजाइन और तैयार किया था, जिनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था। डॉ.बी.आर अंबेडकर, जिन्हें भारतीय संविधान के पिता और मुख्य वास्तुकार के रूप में भी जाना जाता है न केवल अर्थशास्त्र, बल्कि 64 विषयों के मास्टर थे और नौ भाषाओं हिंदी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, फारसी और गुजराती बोल सकते थे। आपको जानकर हैरानी होगी की इन्होंने रोजाना 21 घंटे की पढ़ाई कर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से केवल 2 साल 3 महीने में 8 साल की पढ़ाई पूरी कर ली थी तथा जिस भारतीय ध्वज को पिंगली वेंकय्या द्वारा डिज़ाइन किया गया था, उसमें वह डॉ.अंबेडकर ही थे जिन्हें तिरंगे के बीच में अशोक चक्र रखने का श्रेय दिया जाता है। डॉ.अम्बेडकर का हमेशा से ही एक मत था कि पारंपरिक धार्मिक मूल्यों को छोड़ देना चाहिए और नए विचारों को अपनाना चाहिए। उन्होंने संविधान में निहित सभी नागरिकों के लिए गरिमा, एकता, स्वतंत्रता और अधिकारों पर विशेष जोर दिया और हर क्षेत्र में लोकतंत्र की वकालत की चाहे वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ही क्यों न रही हो, उनके लिए सामाजिक न्याय का मतलब अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम खुशी था। उन्होंने समाज के उत्पीड़ित और दुखी क्षेत्रों के लिए मानवाधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिसके कारण अम्बेडकर को उनकी उम्र के आधुनिक बुद्ध के रूप में भी पहचाना जाता है, यह उपाधि उन्हें महान बौद्ध भिक्षु महंत वीर चंद्रमणि ने दी थी, जिन्होंने बाबासाहेब को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी।
 अंबेडकर को 2012 में एक पोल द्वारा "महानतम भारतीय" चुना गया था, जिसमें महात्मा गांधी को शामिल नहीं किया गया था, यह कहते हुए कि गांधी जी को चुनाव में हरा पाना संभव नहीं था।  मतदान का आयोजन हिस्ट्री टीवी 18 और सीएनएन आईबीएन द्वारा किया गया था जिसमें लगभग 20 मिलियन वोट डाले गए थे अर्थशास्त्र में उनकी भूमिका के कारण, एक उल्लेखनीय भारतीय अर्थशास्त्री, नरेंद्र जाधव, ने कहा है कि अंबेडकर "सभी समय के सबसे अधिक शिक्षित भारतीय अर्थशास्त्री थे।"वही अमर्त्य सेन ने कहा कि अंबेडकर "मेरे अर्थशास्त्र के पिता" हैं,और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान अद्भुत है और हमेशा के लिए याद किया जाएगा। डॉ.अंबेडकर ने शिक्षा को अशिक्षा, अज्ञानता और अंधविश्वास से सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की मुक्ति के लिए एक उपकरण के रूप में देखा।डॉ.अंबेडकर लैंगिक समानता के लिए एक योद्धा थे और विरासत और विवाह में महिलाओं के लिए समान अधिकारों के लिए लड़ते थे,अंबेडकर ने महिला सशक्तीकरण के लिए एक दृष्टिकोण रखा था और भारत में महिलाओं की उन्नति के रास्ते में आने वाली बाधाओं को तोड़ने के लिए खड़े हुए थे। इस प्रकार डॉ.बी.आर अम्बेडकर जी ने जीवन भर न्याय और असमानता के लिए संघर्ष किया। उन्होंने जाति भेदभाव और असमानता के उन्मूलन के लिए काम किया, उन्होंने दृढ़ता से न्याय और सामाजिक समानता में विश्वास किया और उनके प्रेरणादायक जीवन और विचार हमारे दृढ़ विश्वास को मजबूत करते हैं कि संविधान में धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव ना हो और राष्ट्र को पूर्ण प्रतिबद्धता, सकारात्मक सोच, विवेकपूर्ण योजना, इष्टतम प्रयास, सामंजस्यपूर्ण पहल के द्वारा साथ संचालित किया जाना चाहिए ।

Thursday, March 19, 2020

आत्म बोध- एक साधना

अंग्रेजी में एक कहावत है : "वेन लाइफ गिव्स यू ए लेमन, मेक लेमोनेड" ​मतलब जब जिंदगी आपको नींबू दे, तो उसकी
शिकंजी बना कर पी जाओ। ​अर्थात, जिदंगी से मिलने वाले कड़वे अनुभवों का उपयोग आगे की जिदंगी को बेहतर बनाने के लिए करें। दुनिया को साबित करना बंद कर दे कि आप कितने बुद्धिमान हैं। खुद से प्रेम करें अपने आप को कभी भी किसी से कम ना समझें जीवन एक यात्रा है इसमें कुछ लोग हम से आगे हैं तो कुछ लोग हम से पीछे तो कुछ लोग हमारे बराबर भी चौड़े से खड़े हैं तो धैर्य के साथ इस यात्रा में आगे बढ़ते रहें। आज आपकी प्रतिस्पर्धा किसी और से नही बल्कि खुद से है, खुद को अपडेट करें और एक अच्छा अपडेटेड वर्जन बनने का प्रयत्न रोज करे और हाँ दूसरों से अनुमोदन नहीं करे। मेहनत हाथ में लगी मेहँदी की तरह होती है, यदि सावधानी से धीरज रखोगे तो निखार भी बढ़िया आएगा नहीं तो हाथ की रेखाएं भी छिप जाएँगी अब हम 'बाबा आल तू जलाल तू' तो ठहरे नहीं जो भविष्य देख सकते हैं, इसलिए हमारे द्वारा लिया गया निर्णय सही होगा या गलत यह हमें निर्णय लेने के बाद ही ज्ञात होगा। अतः परिस्थिति
को समझिये, खुद पर विश्वास रखिये और तब निर्णय लीजिये। मनुष्य अपनी महत्वाकांक्षा के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन एक बिंदु पर आ कर उसे दिल और दिमाग मे से एक की सुननी पड़ती है और यही वह बिंदु होता है जो तय करता है कि वह महत्वाकांक्षी है या अतिमहत्वाकांक्षी। महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं है, यह एक मानवीय भावना है। हर कोई अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और बढ़ना भी चाहिए  लेकिन महत्वकांक्षा और अतिमहत्वाकांक्षी के बीच आपकी भावनाओं और दिमाग के बीच का नियंत्रण तय करता है की आखिर आप बैंड बजाना  चाहते हैं या जेम्स बाण्ड बनना। बीते हुए कल को जीने का कोई फ़ायदा नही और आने वाले कल को जीने की कोई वज़ह भी नही। जो वक़्त अभी चल रहा है उसे पूरी शिद्दत से जीना सही भी है और तमाम फ्यूचर ओवरथिंकिंग या पास्ट रिग्रेट से बचाव का सीधा सरल और अचूक उपाय भी है इसीलिए मैं चला घोड़ा बेच के सोने। 😉

Monday, February 10, 2020

अन्तर्मन की पुकार

मैं प्रत्येक दिन जब खाली बैठकर सोचता हूँ तो खो जाता हूं उस जीवन का अर्थ खोजने में, उसमें जिसे मैं अर्थहीन कहता हूँ जब चूक जाता हूँ जीवन को थोड़ा सा भी समझने में तो मैं उस प्रत्येक रात्रि कुछ ना कुछ पढ़ता हूँ - कुछ कठिन कविताएं, कुछ किताबें फिर समझता हूँ कुछ शब्द और उन शब्दों के गहरे अर्थ तब यह अर्थहीनता ही अर्थपूर्ण लगने लगती है। मुझे मालूम है की शब्द हैं कभी व्यर्थ नहीं जाते परंतु पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए किन्तु मेरे अंतर्मन ने मुझसे कहा--लिखा कर तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए इसलिए अब मैं लिखा करता हूँ अपने अन्तरमन की अनुभूति जिसे बिना रँगे चुने कागज पर बस उतार देता हूँ ।