Saturday, June 19, 2021

"फ्लाइंग सिख" मिल्खा सिंह... सिर्फ नाम ही काफी है

जाना तो सबको है, कुछ जीवन की चुनौतियों को "टरकाकर" जाते हैं और कुछ उनसे "टकराकर" जाते हैं लेकिन चंद लोग ही होते हैं जो आनेवाली पीढ़ियों के लिए मिशाल बनकर जाते हैं। मिल्खा जी उन्हीं चंद लोगों में रहे उनके जीवन की प्रत्येक कडी़ और अध्याय प्रेरणा के असंख्य उदाहरण समेटे है। अपने प्रेरणादायी व्यक्तित्व,खेल भावना एवम् अप्रतिम खेल कौशल के लिए विख्यात मिल्खा सिंह जी की जिंदादिली को मेरा नमन।
     विनम्र श्रद्धांजलि... #MilkhaSing

Monday, May 31, 2021

दान नहीं दानी का हृदय देखिये

केन्या द्वारा भेजे गए 12 टन अनाज पर बहुत से लोग मज़ाक उड़ा रहे है। सोशल मीडिया पर केन्या को "भिखारी, भिखमंगा, गरीब" आदि आदि कहा जा रहा है। अब एक छोटा सा वाक़या सुनिए। आपने अमरीका का नाम सुना होगा, मैनहैटन का भी, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का भी और ओसामा बिन लादेन का भी। जो ज़्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा वो है 'इनोसाईन गाँव' जो पड़ता है केन्या और तंजानिया के बॉर्डर पर और यहाँ की लोकल जनजाति है 'मसाई'।अमेरिका पर हुए 9/11 के हमले की ख़बर मसाई लोगों तक पहुचने में कई महीने लग गए। ये ख़बर उन तक तब पहुँची जब उनके गाँव के पास के ही कस्बे में रहने वाली, स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी की मेडिकल स्टूडेंट किमेली नाओमा छुट्टियों में वापस केन्या आयी और वहाँ की लोकल जनजाति मसाई को 9/11 का आंखों देखा हाल सुनाया। कोई बिल्डिंग इतनी ऊंची हो सकती है कि वहाँ से गिरने पर जान चली जाए, झोपड़ी में रहने वाले मसाई लोगों के लिए ये बात अविश्वसनीय थी मगर फिर भी उन लोगों ने अमरीकियों के दुःख को महसूस किया और उसी मेडिकल स्टूडेंट के माध्यम से केन्या की राजधानी नैरोबी में अमेरिकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ विलियम ब्रांगिक को एक पत्र भिजवाया जिसे पढ़ने के बाद विलियम ब्रांगिक ने पहले हवाई जहाज का सफर किया, उसके बाद कई मील तक टूटी फूटी सड़क पर कठिनाई का रास्ता पर करते हुए मसाई जनजाति के गाँव पहुँचे।गाँव पहुँचने पर मसाई जनजाति के लोग इक्कट्ठा हुए और एक कतार में 14 गायें ले कर अमरीकी दूतावास के डिप्टी चीफ़ के पास पहुँचे। मसाईयों के एक बुज़ुर्ग ने गायों से बंधी रस्सी डिप्टी चीफ़ के हांथों पे पकड़ाते हुए एक तख़्ती की तरफ इशारा कर दिया। जानते हैं उस तख़्ती पर क्या लिखा था? लिखा था- "इस दुःख की घड़ी में अमरीका के लोगों की मदद के लिए हम ये गायें उन्हें दान कर रहे हैं"। जी हाँ, उस पत्र को पढ़ कर दुनियाँ के सबसे ताकतवर और समृद्धि देश का राजदूत सैकड़ो मील चल कर चौदह गायों का दान लेने आया था। गायों के ट्रांसपोर्ट की कठिनाई और कानूनी बाध्यता के कारण गायें तो नहीं जा पायीं मगर उनको बेंचकर एक मसाई आभूषण ख़रीद कर 9/11 मेमोरियल म्यूजियम में रखने की पेशकश की गई। जब ये बात अमरीका के आम नागरिकों तक पहुँची तो पता है क्या हुआ? उन्होंने आभूषण की जगह गाय लेने की ज़िद्द कर दी। ऑनलाइन पिटीशन साइन किये गए की उन्हें आभूषण नहीं गाय ही चाहिए, अधिकारियों को ईमेल लिखे गए, नेताओं से बात की गई और करोड़ों अमरीका वासियों ने मसाई जनजाति और केन्या के लोगों को इस अभूतपूर्व प्रेम के लिए कृतज्ञ भाव से धन्यवाद दिया, उनका अभिनंदन किया।12 टन सामग्री को सहर्ष स्वीकार करिये। दान नहीं, दानी का हृदय देखिये, कंकड़ नहीं, कंकड़ उठा कर सेतु में लगाने वाली गिलहरी की श्रद्धा देखिये। #ThankYouKenya

Thursday, October 29, 2020

रक्तबीज रुपी गरीबी

 गणतन्त्र से गण गायब हो रहा है और तंत्र काबिज है फिर भी मैंने हमेशा अपने को परिभाषाओं से दूर और अनुभवों में रखने का प्रयत्न किया... लेकिन एक सवाल जो बार बार मेरे भूंसा भरे दिमाग में आता है कि 73 साल पहले मिली आजादी और आजाद देश का नागरिक होने के अलावा किस बात पर गर्व करूँ ? गर्व करूँ, आजादी के 73 सालों में रक्तबीज की तरह बढ़ती गरीबी पर? गर्व करूँ, जान से भी अधिक भूख की चिंता पर? या इस बात पर की अगर हमारे विचार वाकई अमीर हो जाएं तो क्या गरीबी खत्म हो सकती है?

 गरीबी एक अदृश्य समस्या है जो किसी व्यक्ति और उसके सामाजिक जीवन को कई तरह से बुरी तरह प्रभावित करती है एक ऐसी स्थिति है जिसे कोई भी नहीं जीना चाहता है। इस ग्रह पर मानवता की भलाई के लिए गरीबी की समस्या को तत्काल आधार पर हल करना बहुत आवश्यक है, वैसे हमारे प्रखर प्रखण्ड विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का लक्ष्य गरीबी दूर करना नहीं बल्कि समृद्धि लाना होना चाहिये क्योंकि समृद्धि से ही गरीबी उन्मूलन संभव है परन्तु बता दूँ कि गाँवों में अगर 20 रुपए में शुद्ध पानी की बोतल मिल रही है तो यह तरक्की नहीं, प्रजातंत्र के मुँह पर तमाचा है कि सरकारें 73 सालों में भी देश की जनता को शुद्ध पानी नहीं पिला सकी ऐसे ही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम सब बिना तुलसी गंगाजल पिये ही अपनी-अपनी चुप्पियों को लेकर मर जाएँगे और हमारा सबसे आख़िरी ख़याल होगा हमें बोलना चाहिए था... इसलिए बोलिये और अपनी सही बात को तार्किक रूप से रखिये क्योकि लोकतंत्र में सामाजिक सुरक्षा पाना हर नागरिक का अधिकार

है यह नियम सब पर लागू होता है आप पर भी और मुझ पर भी । फिलहाल बस यही कहना है की आजादी के 73 वर्षों बाद भी हमारे कृषि प्रधान देश में कम से कम लोगों को भूखे पेट तो नहीं ही सोना चाहिए...खैर गरीब चाहे भारत का हो या पडोसी पाकिस्तान का या किसी और देश का गरीब और गरीबी एक जैसे होती है इसका अपना कोई नहीं...। 

 नितिन सिंह

Monday, April 13, 2020

संविधान निर्माता: डॉ. बी.आर अम्बेडकर

हम भारतीय समानता, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, बंधुत्व और सामाजिकता के सिद्धांतों पर जीते हैं और यही हमारे भारतीय संविधान द्वारा हमें सिखाया गया है। भारत के संविधान को एक न्यायविद्, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ के साथ-साथ सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष का प्रतीक भीमराव रामजी अंबेडकर ने डिजाइन और तैयार किया था, जिनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 को हुआ था। डॉ.बी.आर अंबेडकर, जिन्हें भारतीय संविधान के पिता और मुख्य वास्तुकार के रूप में भी जाना जाता है न केवल अर्थशास्त्र, बल्कि 64 विषयों के मास्टर थे और नौ भाषाओं हिंदी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, फारसी और गुजराती बोल सकते थे। आपको जानकर हैरानी होगी की इन्होंने रोजाना 21 घंटे की पढ़ाई कर लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से केवल 2 साल 3 महीने में 8 साल की पढ़ाई पूरी कर ली थी तथा जिस भारतीय ध्वज को पिंगली वेंकय्या द्वारा डिज़ाइन किया गया था, उसमें वह डॉ.अंबेडकर ही थे जिन्हें तिरंगे के बीच में अशोक चक्र रखने का श्रेय दिया जाता है। डॉ.अम्बेडकर का हमेशा से ही एक मत था कि पारंपरिक धार्मिक मूल्यों को छोड़ देना चाहिए और नए विचारों को अपनाना चाहिए। उन्होंने संविधान में निहित सभी नागरिकों के लिए गरिमा, एकता, स्वतंत्रता और अधिकारों पर विशेष जोर दिया और हर क्षेत्र में लोकतंत्र की वकालत की चाहे वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ही क्यों न रही हो, उनके लिए सामाजिक न्याय का मतलब अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम खुशी था। उन्होंने समाज के उत्पीड़ित और दुखी क्षेत्रों के लिए मानवाधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए कई सामाजिक आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिसके कारण अम्बेडकर को उनकी उम्र के आधुनिक बुद्ध के रूप में भी पहचाना जाता है, यह उपाधि उन्हें महान बौद्ध भिक्षु महंत वीर चंद्रमणि ने दी थी, जिन्होंने बाबासाहेब को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी।
 अंबेडकर को 2012 में एक पोल द्वारा "महानतम भारतीय" चुना गया था, जिसमें महात्मा गांधी को शामिल नहीं किया गया था, यह कहते हुए कि गांधी जी को चुनाव में हरा पाना संभव नहीं था।  मतदान का आयोजन हिस्ट्री टीवी 18 और सीएनएन आईबीएन द्वारा किया गया था जिसमें लगभग 20 मिलियन वोट डाले गए थे अर्थशास्त्र में उनकी भूमिका के कारण, एक उल्लेखनीय भारतीय अर्थशास्त्री, नरेंद्र जाधव, ने कहा है कि अंबेडकर "सभी समय के सबसे अधिक शिक्षित भारतीय अर्थशास्त्री थे।"वही अमर्त्य सेन ने कहा कि अंबेडकर "मेरे अर्थशास्त्र के पिता" हैं,और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनका योगदान अद्भुत है और हमेशा के लिए याद किया जाएगा। डॉ.अंबेडकर ने शिक्षा को अशिक्षा, अज्ञानता और अंधविश्वास से सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की मुक्ति के लिए एक उपकरण के रूप में देखा।डॉ.अंबेडकर लैंगिक समानता के लिए एक योद्धा थे और विरासत और विवाह में महिलाओं के लिए समान अधिकारों के लिए लड़ते थे,अंबेडकर ने महिला सशक्तीकरण के लिए एक दृष्टिकोण रखा था और भारत में महिलाओं की उन्नति के रास्ते में आने वाली बाधाओं को तोड़ने के लिए खड़े हुए थे। इस प्रकार डॉ.बी.आर अम्बेडकर जी ने जीवन भर न्याय और असमानता के लिए संघर्ष किया। उन्होंने जाति भेदभाव और असमानता के उन्मूलन के लिए काम किया, उन्होंने दृढ़ता से न्याय और सामाजिक समानता में विश्वास किया और उनके प्रेरणादायक जीवन और विचार हमारे दृढ़ विश्वास को मजबूत करते हैं कि संविधान में धर्म और जाति के आधार पर कोई भेदभाव ना हो और राष्ट्र को पूर्ण प्रतिबद्धता, सकारात्मक सोच, विवेकपूर्ण योजना, इष्टतम प्रयास, सामंजस्यपूर्ण पहल के द्वारा साथ संचालित किया जाना चाहिए ।

Thursday, March 19, 2020

आत्म बोध- एक साधना

अंग्रेजी में एक कहावत है : "वेन लाइफ गिव्स यू ए लेमन, मेक लेमोनेड" ​मतलब जब जिंदगी आपको नींबू दे, तो उसकी
शिकंजी बना कर पी जाओ। ​अर्थात, जिदंगी से मिलने वाले कड़वे अनुभवों का उपयोग आगे की जिदंगी को बेहतर बनाने के लिए करें। दुनिया को साबित करना बंद कर दे कि आप कितने बुद्धिमान हैं। खुद से प्रेम करें अपने आप को कभी भी किसी से कम ना समझें जीवन एक यात्रा है इसमें कुछ लोग हम से आगे हैं तो कुछ लोग हम से पीछे तो कुछ लोग हमारे बराबर भी चौड़े से खड़े हैं तो धैर्य के साथ इस यात्रा में आगे बढ़ते रहें। आज आपकी प्रतिस्पर्धा किसी और से नही बल्कि खुद से है, खुद को अपडेट करें और एक अच्छा अपडेटेड वर्जन बनने का प्रयत्न रोज करे और हाँ दूसरों से अनुमोदन नहीं करे। मेहनत हाथ में लगी मेहँदी की तरह होती है, यदि सावधानी से धीरज रखोगे तो निखार भी बढ़िया आएगा नहीं तो हाथ की रेखाएं भी छिप जाएँगी अब हम 'बाबा आल तू जलाल तू' तो ठहरे नहीं जो भविष्य देख सकते हैं, इसलिए हमारे द्वारा लिया गया निर्णय सही होगा या गलत यह हमें निर्णय लेने के बाद ही ज्ञात होगा। अतः परिस्थिति
को समझिये, खुद पर विश्वास रखिये और तब निर्णय लीजिये। मनुष्य अपनी महत्वाकांक्षा के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन एक बिंदु पर आ कर उसे दिल और दिमाग मे से एक की सुननी पड़ती है और यही वह बिंदु होता है जो तय करता है कि वह महत्वाकांक्षी है या अतिमहत्वाकांक्षी। महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं है, यह एक मानवीय भावना है। हर कोई अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और बढ़ना भी चाहिए  लेकिन महत्वकांक्षा और अतिमहत्वाकांक्षी के बीच आपकी भावनाओं और दिमाग के बीच का नियंत्रण तय करता है की आखिर आप बैंड बजाना  चाहते हैं या जेम्स बाण्ड बनना। बीते हुए कल को जीने का कोई फ़ायदा नही और आने वाले कल को जीने की कोई वज़ह भी नही। जो वक़्त अभी चल रहा है उसे पूरी शिद्दत से जीना सही भी है और तमाम फ्यूचर ओवरथिंकिंग या पास्ट रिग्रेट से बचाव का सीधा सरल और अचूक उपाय भी है इसीलिए मैं चला घोड़ा बेच के सोने। 😉

Monday, February 10, 2020

अन्तर्मन की पुकार

मैं प्रत्येक दिन जब खाली बैठकर सोचता हूँ तो खो जाता हूं उस जीवन का अर्थ खोजने में, उसमें जिसे मैं अर्थहीन कहता हूँ जब चूक जाता हूँ जीवन को थोड़ा सा भी समझने में तो मैं उस प्रत्येक रात्रि कुछ ना कुछ पढ़ता हूँ - कुछ कठिन कविताएं, कुछ किताबें फिर समझता हूँ कुछ शब्द और उन शब्दों के गहरे अर्थ तब यह अर्थहीनता ही अर्थपूर्ण लगने लगती है। मुझे मालूम है की शब्द हैं कभी व्यर्थ नहीं जाते परंतु पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए किन्तु मेरे अंतर्मन ने मुझसे कहा--लिखा कर तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए इसलिए अब मैं लिखा करता हूँ अपने अन्तरमन की अनुभूति जिसे बिना रँगे चुने कागज पर बस उतार देता हूँ ।

Friday, August 2, 2019

रवीश कुमार: जनमानस की आवाज

एक भारतीय टीवी एंकर, लेखक, पत्रकार और लेखन, पत्रकारिता में मेरे आदर्श जो हर रोज मिलने वाली बजबजाती गालियों और गडगडा़ती तालियों के बीच अपना काम अनवरत  करते रहे .. लिखते रहे. बोलते रहे,बिना डरे, बिना बदले .. जो भारतीय राजनीति और समाज से संबंधित विषयों को मुखरता के साथ जनता के सामने रखते रहे हैं, किसी भी विषय को जिस नजरिये से देखते हैं ,वो उनको औरों से अलग और ऊपर खड़ा कर देता है।
 बिहार के पूर्व जिले के मोतीहारी में पैदा हुए, लोयोला हाई स्कूल, पटना, से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, और फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह दिल्ली आ गये फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया। अपनी उच्चस्तरीय पत्रकारिता, सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के बूते  आज उन्हें वर्ष 2019 के 'रैमॉन मैगसेसे' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अवॉर्ड देने वाले संस्थान ने कहा है कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता के ज़रिए उनकी आवाज़ को मुख्यधारा में ले आए, जिनकी हमेशा उपेक्षा की जाती है। रैमॉन मैग्सेसे संस्थान की ओर से कहा गया है कि अगर आप लोगों की आवाज़ बनते हैं तो आप पत्रकार हैं और वाकई इस देश को आज रवीश कुमार जैसे निर्भीक स्पष्ट साहसिक और परिवर्तनकारी नेतृत्व वाले पत्रकार की आवश्यकता है।  आपको रैमॉन मैगसेसे' पुरस्कार मिलने पर ह्रदय से हार्दिक शुभकामनाएँ।

हर रोज़ गिर कर भी
मुकम्मल खङे हैं
एै ज़िन्दगी देख,
मेरे हौंसले तुझसे भी बङे हैं

Thursday, July 25, 2019

कारगिल विजय: ये युद्ध नहीं आसान

जिंदगी जब तुझको समझा,
मौत फिर क्या चीज है,
ऐ वतन तू हीं बता, तुझसे बड़ा क्या चीज है
भरी जवानी में मां भारती के चरणों में,अपने प्राणों का बलिदान करने वाले, अमर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पण करता हूँ। कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।
भगवत गीता का एक श्लोक है: -
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌’
यानि 'या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।' शायद इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के उन शूरवीरों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को कारगिल की धरती से पीछे खदेड़ दिया था। मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी...यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।कारगिल विजय का हिस्सा रहे सभी सैनिकों को नमन। आपकी वीरता आज भी लोक स्मृति में सजीव है जिसे भावी पीढ़ियां श्रद्धापूर्वक स्मरण करेंगी। कृतज्ञ राष्ट्र अमर शहीदों, वीर सैनिकों और उनके परिजनों के त्याग का सम्मान करता है।
रक्त वीर शहीदों का था, हर सपूत बलिदानी था, कारगिल पर्वत शिखर पर पवन चला तूफानी था, हिमप्रपात बन हिमगिरि से रक्त शत्रु का जमा दिया, विजय दिवस की शौर्य पताका देने वाला अभिमानी था।

मैं नहीं हम

सोचा था कोई ग़जल लिखूँ ,4-5 शेर में ही काम हो जाता। पर शायद अब कवितायें नाराज हैं, ख्यालों में आराम की जगह काम आ चुका है और वो क्या हैं ना कि आजकल राइमिंग में भी मैथमेटिक्स आ जाती हैं तो फाइनली ये आईडिया ड्रॉप करना पड़ा। माना की मेरा इस तरह करियर के लिए सीरियस होना अच्छा है। पर सही मायने में मुझे ये इतना भी अच्छा नही लगता। मैं बिलकुल खाली सा हो गया हूँ। गाने नही सुन पाता, खेल भी नहीं पाता,बात भी नही कर पाता तो किस्से भी नही होते मेरे पास जो लिख सकूँ। उदासी भी नही बची वरना कुछ कविता ही बन जाती। क्रिकेट, उसकी तो बात ही नही करनी। सिर्फ और सिर्फ सिलेबस की किताबें है, उनसे दिक्कत नही हैं, वो भी अच्छी हैं, पर फिर भी कुछ खालीपन तो आ ही गया हैं।

वैसे तो कितने सारे किस्सों को लिख के रखा हैं मैंने ,लेकिन फिर भी कुछ कम ही लगते हैं। पिछले 18 महीनो में मैंने जाने कितने किस्से गँवा दिये जो मैं लिखना चाहता था- मैं लिखना चाहता था मेरे जिएं हुए हर लम्हे को, पर मैंने दूसरा रास्ता चुन लिया और वो सब अधूरे किस्से अधूरे रहे। शायद उन किस्सों का अधूरापन ही मुझे कभी भरने नही देता इसलिए इतना खालीपन रहता हैं मेरे पास।

भले ही मैने कितना भी सहेज के रखे हों लेकिन फिर भी सबकुछ तो नही सम्भाला जा सकता। 'मैं' उन किस्सों को नही सम्भाल पाया लेकिन इसका मतलब ये भी नही न की 'मैं' सम्भालना ही छोड़ दूंगा। मैं आने वाले किस्सों को सम्भाल लूँगा। मैं फिर से लिखूंगा फिर से आगे बढूंगा क्योंकि मुझे लगता हैं की मैं कुछ भी कर लूँ पर जो सुख लिखने में हैं वो सुख किसी में भी नही हैं।

चुकीं आज मुझे लिखना ही है तो कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा और कोई ऑप्शन भी नही हैं। इसलिये लिख रहा हूँ, पता नही क्या लिखूंगा और कहाँ खत्म करूँगा। वैसे तो 'मैं' पर लिखना था पर पता नही अब कुछ सूझ नही रहा इसलिए खुद पे लिख रहा हूँ।

अजीब हैं पर सच तो यही हैं की मुझे 'मैं' पसंद नही हैं। मुझे तो अब भी वही 'हम' पसंद वेलडिसिप्लिन्ड और कॉंफिडेंट। दिनभर होने वाली अनाब सनाब बातें चंद मिनटों में सिमट गई हैं, और ये भी नही की मुझे मालूम नही चला, मुझे सब मालूम हैं। जाने कितनी बार मैं हताश हुआ और जाने कितनी बार मुझे लगा की मैं ये नही कर सकता ये मेरे बस की बात हैं ही नही। लेकिन हर बार तूने मुझे मुझ से ही बचाया। थैंक्यू मुझे इस रास्ते पर सहारा देने के लिए। मुझे मेरी कहानी के हर हिस्से से प्यार हैं, मुझे तुझसे जुड़े हर किस्से से प्यार हैं। अरे वाह, राइमिंग हो गई। देख लिखते लिखते फिर से कविता बनने लगी हैं।
मैं शायद जैसा था वैसा कभी नही हो पाउँगा लेकिन मैंने ये तुझसे पहले भी कहा था और अब भी कहता हूँ, मैं नही जानता आगे क्या होगा और जानना भी नही चाहता क्योंकी वो मेरे बस में हैं ही नही, मेरे बस में सिर्फ कोशिश करना हैं और वो मैं आखिरी दम तक करूँगा।

"नितिन सिंह"