नितिन सिंह
Saturday, June 19, 2021
"फ्लाइंग सिख" मिल्खा सिंह... सिर्फ नाम ही काफी है
Monday, May 31, 2021
दान नहीं दानी का हृदय देखिये
Thursday, October 29, 2020
रक्तबीज रुपी गरीबी
गणतन्त्र से गण गायब हो रहा है और तंत्र काबिज है फिर भी मैंने हमेशा अपने को परिभाषाओं से दूर और अनुभवों में रखने का प्रयत्न किया... लेकिन एक सवाल जो बार बार मेरे भूंसा भरे दिमाग में आता है कि 73 साल पहले मिली आजादी और आजाद देश का नागरिक होने के अलावा किस बात पर गर्व करूँ ? गर्व करूँ, आजादी के 73 सालों में रक्तबीज की तरह बढ़ती गरीबी पर? गर्व करूँ, जान से भी अधिक भूख की चिंता पर? या इस बात पर की अगर हमारे विचार वाकई अमीर हो जाएं तो क्या गरीबी खत्म हो सकती है?
गरीबी एक अदृश्य समस्या है जो किसी व्यक्ति और उसके सामाजिक जीवन को कई तरह से बुरी तरह प्रभावित करती है एक ऐसी स्थिति है जिसे कोई भी नहीं जीना चाहता है। इस ग्रह पर मानवता की भलाई के लिए गरीबी की समस्या को तत्काल आधार पर हल करना बहुत आवश्यक है, वैसे हमारे प्रखर प्रखण्ड विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का लक्ष्य गरीबी दूर करना नहीं बल्कि समृद्धि लाना होना चाहिये क्योंकि समृद्धि से ही गरीबी उन्मूलन संभव है परन्तु बता दूँ कि गाँवों में अगर 20 रुपए में शुद्ध पानी की बोतल मिल रही है तो यह तरक्की नहीं, प्रजातंत्र के मुँह पर तमाचा है कि सरकारें 73 सालों में भी देश की जनता को शुद्ध पानी नहीं पिला सकी ऐसे ही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम सब बिना तुलसी गंगाजल पिये ही अपनी-अपनी चुप्पियों को लेकर मर जाएँगे और हमारा सबसे आख़िरी ख़याल होगा हमें बोलना चाहिए था... इसलिए बोलिये और अपनी सही बात को तार्किक रूप से रखिये क्योकि लोकतंत्र में सामाजिक सुरक्षा पाना हर नागरिक का अधिकार
नितिन सिंह
Monday, April 13, 2020
संविधान निर्माता: डॉ. बी.आर अम्बेडकर
Thursday, March 19, 2020
आत्म बोध- एक साधना
शिकंजी बना कर पी जाओ। अर्थात, जिदंगी से मिलने वाले कड़वे अनुभवों का उपयोग आगे की जिदंगी को बेहतर बनाने के लिए करें। दुनिया को साबित करना बंद कर दे कि आप कितने बुद्धिमान हैं। खुद से प्रेम करें अपने आप को कभी भी किसी से कम ना समझें जीवन एक यात्रा है इसमें कुछ लोग हम से आगे हैं तो कुछ लोग हम से पीछे तो कुछ लोग हमारे बराबर भी चौड़े से खड़े हैं तो धैर्य के साथ इस यात्रा में आगे बढ़ते रहें। आज आपकी प्रतिस्पर्धा किसी और से नही बल्कि खुद से है, खुद को अपडेट करें और एक अच्छा अपडेटेड वर्जन बनने का प्रयत्न रोज करे और हाँ दूसरों से अनुमोदन नहीं करे। मेहनत हाथ में लगी मेहँदी की तरह होती है, यदि सावधानी से धीरज रखोगे तो निखार भी बढ़िया आएगा नहीं तो हाथ की रेखाएं भी छिप जाएँगी अब हम 'बाबा आल तू जलाल तू' तो ठहरे नहीं जो भविष्य देख सकते हैं, इसलिए हमारे द्वारा लिया गया निर्णय सही होगा या गलत यह हमें निर्णय लेने के बाद ही ज्ञात होगा। अतः परिस्थिति
को समझिये, खुद पर विश्वास रखिये और तब निर्णय लीजिये। मनुष्य अपनी महत्वाकांक्षा के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन एक बिंदु पर आ कर उसे दिल और दिमाग मे से एक की सुननी पड़ती है और यही वह बिंदु होता है जो तय करता है कि वह महत्वाकांक्षी है या अतिमहत्वाकांक्षी। महत्वाकांक्षी होना कोई बुरी बात नहीं है, यह एक मानवीय भावना है। हर कोई अपने क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है और बढ़ना भी चाहिए लेकिन महत्वकांक्षा और अतिमहत्वाकांक्षी के बीच आपकी भावनाओं और दिमाग के बीच का नियंत्रण तय करता है की आखिर आप बैंड बजाना चाहते हैं या जेम्स बाण्ड बनना। बीते हुए कल को जीने का कोई फ़ायदा नही और आने वाले कल को जीने की कोई वज़ह भी नही। जो वक़्त अभी चल रहा है उसे पूरी शिद्दत से जीना सही भी है और तमाम फ्यूचर ओवरथिंकिंग या पास्ट रिग्रेट से बचाव का सीधा सरल और अचूक उपाय भी है इसीलिए मैं चला घोड़ा बेच के सोने। 😉
Monday, February 10, 2020
अन्तर्मन की पुकार
Friday, August 2, 2019
रवीश कुमार: जनमानस की आवाज
बिहार के पूर्व जिले के मोतीहारी में पैदा हुए, लोयोला हाई स्कूल, पटना, से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, और फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह दिल्ली आ गये फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया। अपनी उच्चस्तरीय पत्रकारिता, सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता के बूते आज उन्हें वर्ष 2019 के 'रैमॉन मैगसेसे' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अवॉर्ड देने वाले संस्थान ने कहा है कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता के ज़रिए उनकी आवाज़ को मुख्यधारा में ले आए, जिनकी हमेशा उपेक्षा की जाती है। रैमॉन मैग्सेसे संस्थान की ओर से कहा गया है कि अगर आप लोगों की आवाज़ बनते हैं तो आप पत्रकार हैं और वाकई इस देश को आज रवीश कुमार जैसे निर्भीक स्पष्ट साहसिक और परिवर्तनकारी नेतृत्व वाले पत्रकार की आवश्यकता है। आपको रैमॉन मैगसेसे' पुरस्कार मिलने पर ह्रदय से हार्दिक शुभकामनाएँ।
हर रोज़ गिर कर भी
मुकम्मल खङे हैं
एै ज़िन्दगी देख,
मेरे हौंसले तुझसे भी बङे हैं
Thursday, July 25, 2019
कारगिल विजय: ये युद्ध नहीं आसान
मौत फिर क्या चीज है,
ऐ वतन तू हीं बता, तुझसे बड़ा क्या चीज है
भरी जवानी में मां भारती के चरणों में,अपने प्राणों का बलिदान करने वाले, अमर शहीदों को श्रद्धा सुमन अर्पण करता हूँ। कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।
‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’
यानि 'या तो तू युद्ध में बलिदान देकर स्वर्ग को प्राप्त करेगा अथवा विजयश्री प्राप्त कर पृथ्वी का राज्य भोगेगा।' शायद इसी श्लोक को प्रेरणा मानकर भारत के उन शूरवीरों ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए पाकिस्तानी घुसपैठियों को कारगिल की धरती से पीछे खदेड़ दिया था। मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर बलिदानी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, मगर इनकी यादें हमारे दिलों में हमेशा- हमेशा के लिए बसी रहेंगी...यह दिन है उन शहीदों को याद कर अपने श्रद्धा-सुमन अर्पण करने का, जो हँसते-हँसते मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यह दिन समर्पित है उन्हें, जिन्होंने अपना आज हमारे कल के लिए बलिदान कर दिया।कारगिल विजय का हिस्सा रहे सभी सैनिकों को नमन। आपकी वीरता आज भी लोक स्मृति में सजीव है जिसे भावी पीढ़ियां श्रद्धापूर्वक स्मरण करेंगी। कृतज्ञ राष्ट्र अमर शहीदों, वीर सैनिकों और उनके परिजनों के त्याग का सम्मान करता है।
मैं नहीं हम
वैसे तो कितने सारे किस्सों को लिख के रखा हैं मैंने ,लेकिन फिर भी कुछ कम ही लगते हैं। पिछले 18 महीनो में मैंने जाने कितने किस्से गँवा दिये जो मैं लिखना चाहता था- मैं लिखना चाहता था मेरे जिएं हुए हर लम्हे को, पर मैंने दूसरा रास्ता चुन लिया और वो सब अधूरे किस्से अधूरे रहे। शायद उन किस्सों का अधूरापन ही मुझे कभी भरने नही देता इसलिए इतना खालीपन रहता हैं मेरे पास।
भले ही मैने कितना भी सहेज के रखे हों लेकिन फिर भी सबकुछ तो नही सम्भाला जा सकता। 'मैं' उन किस्सों को नही सम्भाल पाया लेकिन इसका मतलब ये भी नही न की 'मैं' सम्भालना ही छोड़ दूंगा। मैं आने वाले किस्सों को सम्भाल लूँगा। मैं फिर से लिखूंगा फिर से आगे बढूंगा क्योंकि मुझे लगता हैं की मैं कुछ भी कर लूँ पर जो सुख लिखने में हैं वो सुख किसी में भी नही हैं।
चुकीं आज मुझे लिखना ही है तो कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा और कोई ऑप्शन भी नही हैं। इसलिये लिख रहा हूँ, पता नही क्या लिखूंगा और कहाँ खत्म करूँगा। वैसे तो 'मैं' पर लिखना था पर पता नही अब कुछ सूझ नही रहा इसलिए खुद पे लिख रहा हूँ।
अजीब हैं पर सच तो यही हैं की मुझे 'मैं' पसंद नही हैं। मुझे तो अब भी वही 'हम' पसंद वेलडिसिप्लिन्ड और कॉंफिडेंट। दिनभर होने वाली अनाब सनाब बातें चंद मिनटों में सिमट गई हैं, और ये भी नही की मुझे मालूम नही चला, मुझे सब मालूम हैं। जाने कितनी बार मैं हताश हुआ और जाने कितनी बार मुझे लगा की मैं ये नही कर सकता ये मेरे बस की बात हैं ही नही। लेकिन हर बार तूने मुझे मुझ से ही बचाया। थैंक्यू मुझे इस रास्ते पर सहारा देने के लिए। मुझे मेरी कहानी के हर हिस्से से प्यार हैं, मुझे तुझसे जुड़े हर किस्से से प्यार हैं। अरे वाह, राइमिंग हो गई। देख लिखते लिखते फिर से कविता बनने लगी हैं।
मैं शायद जैसा था वैसा कभी नही हो पाउँगा लेकिन मैंने ये तुझसे पहले भी कहा था और अब भी कहता हूँ, मैं नही जानता आगे क्या होगा और जानना भी नही चाहता क्योंकी वो मेरे बस में हैं ही नही, मेरे बस में सिर्फ कोशिश करना हैं और वो मैं आखिरी दम तक करूँगा।
"नितिन सिंह"




