Monday, February 10, 2020

अन्तर्मन की पुकार

मैं प्रत्येक दिन जब खाली बैठकर सोचता हूँ तो खो जाता हूं उस जीवन का अर्थ खोजने में, उसमें जिसे मैं अर्थहीन कहता हूँ जब चूक जाता हूँ जीवन को थोड़ा सा भी समझने में तो मैं उस प्रत्येक रात्रि कुछ ना कुछ पढ़ता हूँ - कुछ कठिन कविताएं, कुछ किताबें फिर समझता हूँ कुछ शब्द और उन शब्दों के गहरे अर्थ तब यह अर्थहीनता ही अर्थपूर्ण लगने लगती है। मुझे मालूम है की शब्द हैं कभी व्यर्थ नहीं जाते परंतु पहले मैं सोचता था उत्तर यदि नहीं मिले तो फिर क्या लिखा जाए किन्तु मेरे अंतर्मन ने मुझसे कहा--लिखा कर तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए इसलिए अब मैं लिखा करता हूँ अपने अन्तरमन की अनुभूति जिसे बिना रँगे चुने कागज पर बस उतार देता हूँ ।

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